समावेशी शिक्षा, निर्देशन और परामर्श
शैक्षिक समावेशन से अभिप्राय
- समावेशी शिक्षा का अर्थ है कि सभी बच्चे, चाहे उनकी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, या आर्थिक स्थिति कुछ भी
हो, एक समान शिक्षा प्राप्त करें।
- यह प्रणाली विविधता का सम्मान करती है और सुनिश्चित करती है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चे मुख्यधारा की
कक्षा में शामिल हों।
- "समावेशी शिक्षा सभी बच्चों को समान अवसर प्रदान करने का एक दृष्टिकोण है।" – UNESCO
- नोट: यह शिक्षा का अधिकार (RTE) 2009 और RPWD Act 2016 का आधार है।
पहचान, प्रकार, और निराकरण
- पहचान: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान उनके व्यवहार, शारीरिक स्थिति, अधिगम क्षमता, और
सामाजिक अंतःक्रिया से होती है।
- प्रकार:
- अपवंचित वर्ग: आर्थिक रूप से कमजोर, सामाजिक रूप से पिछड़े।
- भाषा: विभिन्न भाषाई पृष्ठभूमि के बच्चे।
- धर्म, जाति, क्षेत्र, वर्ण: सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता।
- लिंग: लैंगिक समानता को बढ़ावा।
- शारीरिक दक्षता: दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, वाक्/अस्थिबाधित।
- मानसिक दक्षता: बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज्म, डिस्लेक्सिया।
- निराकरण: अनुकूलित शिक्षण, विशेष उपकरण, प्रशिक्षित शिक्षक, और सामाजिक जागरूकता।
समावेशन के लिए आवश्यक उपकरण, सामग्री, विधियाँ, टीएलएम, और अभिवृत्तियाँ
- उपकरण: ब्रेल मशीन, श्रवण यंत्र, व्हीलचेयर, स्क्रीन रीडर।
- सामग्री: ब्रेल पुस्तकें, ऑडियो सामग्री, बड़े अक्षरों की किताबें।
- विधियाँ: व्यक्तिगत शिक्षण योजना (IEP), सहयोगात्मक अधिगम, खोज विधि।
- टीएलएम (Teaching Learning Materials): चार्ट, मॉडल, डिजिटल टूल्स, ब्रेल किट, संकेत भाषा कार्ड।
- अभिवृत्तियाँ: सहानुभूति, समानता, धैर्य, और सकारात्मक दृष्टिकोण।
समावेशित बच्चों का अधिगम जाँचने हेतु टूल्स और तकनीक
- टूल्स: चेकलिस्ट, पोर्टफोलियो, अनुकूलित प्रश्नपत्र (ब्रेल, ऑडियो), रुब्रिक।
- तकनीक: निरंतर और समग्र मूल्यांकन (CCE), फॉर्मेटिव मूल्यांकन, पीयर मूल्यांकन, डिजिटल टेस्टिंग।
- नोट: मूल्यांकन बच्चे की क्षमता और आवश्यकता के अनुरूप होना चाहिए।
समावेशित बच्चों के लिए विशेष शिक्षण विधियाँ (विस्तृत नोट्स)
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ब्रेललिपि: ब्रेल एक उभरी हुई लिपि है जिसे दृष्टिबाधित बच्चों के लिए विकसित किया गया है।
इसमें छह बिंदुओं (डॉट्स) के विभिन्न संयोजन होते हैं जो अक्षरों, संख्याओं और चिह्नों का प्रतिनिधित्व
करते हैं।
दृष्टिबाधित छात्र इसे उंगलियों से स्पर्श कर पढ़ सकते हैं। यह उन्हें स्वतंत्र रूप से पढ़ने और लिखने
की क्षमता प्रदान करता है।
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संकेत भाषा: संकेत भाषा श्रवणबाधित और मूक बच्चों के लिए संचार का प्रमुख माध्यम है।
इसमें हाथों की गतिविधियों, चेहरे के हावभाव और शरीर की गतियों का प्रयोग किया जाता है।
विद्यालयों में संकेत भाषा सिखाने से ये बच्चे भी बातचीत और अध्ययन में सक्रिय भागीदारी कर पाते हैं।
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अनुकूलित गतिविधियाँ: शारीरिक अक्षमता वाले बच्चों के लिए विशेष खेल और गतिविधियाँ तैयार की जाती
हैं।
उदाहरण के लिए, गेंदबाजी को हल्की गेंद से कराना, खेलों में विशेष उपकरणों का प्रयोग कराना आदि।
इसका उद्देश्य बच्चों में आत्मविश्वास और सक्रिय भागीदारी बढ़ाना होता है।
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टेक्स्ट-टू-स्पीच/स्पीच-टू-टेक्स्ट: यह डिजिटल तकनीक विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सहायक
होती है।
दृष्टिबाधित छात्रों के लिए टेक्स्ट-टू-स्पीच (TTS) स्क्रीन पर लिखे शब्दों को आवाज़ में बदल देता है।
वहीं, स्पीच-टू-टेक्स्ट (STT) श्रवणबाधित बच्चों को बोले गए शब्दों को लिखित रूप में उपलब्ध कराता है।
इससे शिक्षा में समान अवसर मिलता है।
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IEP (Individualized Education Plan): यह प्रत्येक विशेष आवश्यकता वाले छात्र के लिए अलग से बनाई
गई शैक्षणिक योजना है।
इसमें बच्चे की व्यक्तिगत क्षमता, कमज़ोरी, लक्ष्य और सहायक साधनों को ध्यान में रखते हुए शिक्षण
रणनीतियाँ तैयार की जाती हैं।
IEP में शिक्षक, अभिभावक और विशेषज्ञ मिलकर योजना बनाते हैं ताकि बच्चे की प्रगति सुनिश्चित हो सके।
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संसाधन कक्ष (Resource Room): समावेशी विद्यालयों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए
अतिरिक्त सहयोग उपलब्ध कराने हेतु एक संसाधन कक्ष बनाया जाता है।
इसमें विशेष शिक्षण सामग्री, सहायक उपकरण और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध रहते हैं।
यह कक्ष बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान और अभ्यास का अवसर देता है।
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सहायक उपकरण: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा और जीवन को सरल बनाने के लिए सहायक उपकरणों
का प्रयोग किया जाता है।
जैसे – श्रवणयंत्र, ह्वीलचेयर, विशेष पेंसिल ग्रिप, स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर, ऑर्थोटिक उपकरण आदि।
ये बच्चों को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनने में मदद करते हैं।
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सहपाठी सहयोग (Peer Tutoring): इसमें सामान्य बच्चों को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ
मिलाकर पढ़ाया जाता है।
यह न केवल विशेष बच्चों को सीखने में मदद करता है बल्कि सामान्य बच्चों में सहानुभूति, सहयोग और नेतृत्व
गुण भी विकसित करता है।
इससे कक्षा का वातावरण अधिक समावेशी और सहयोगी बनता है।
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बहु-संवेदी दृष्टिकोण (Multisensory Approach): इसमें बच्चों को पढ़ाने के लिए दृष्टि, श्रवण,
स्पर्श और गतिविधि का उपयोग किया जाता है।
जैसे – चित्र देखकर समझाना, आवाज़ सुनाकर याद कराना, मॉडल को छूकर अनुभव करना आदि।
यह दृष्टिकोण विशेष रूप से सीखने में कठिनाई (Learning Disability) वाले बच्चों के लिए प्रभावी होता है।
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लचीला पाठ्यक्रम (Flexible Curriculum): सभी बच्चों की सीखने की गति और क्षमताएँ अलग-अलग होती
हैं।
इसलिए पाठ्यक्रम को बच्चों की आवश्यकताओं और क्षमताओं के अनुसार लचीला बनाया जाता है।
इसमें कठिन विषयों को सरल बनाना, अधिक प्रायोगिक उदाहरण देना और छोटे-छोटे मॉड्यूल में बाँटना शामिल
होता है।
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डिफरेंशिएटेड इंस्ट्रक्शन (Differentiated Instruction): इसमें शिक्षक एक ही विषय को अलग-अलग
तरीकों से समझाते हैं।
उदाहरण के लिए, गणित के एक सवाल को किसी बच्चे को चित्र द्वारा, किसी को कहानी द्वारा और किसी को
प्रैक्टिकल गतिविधि से समझाया जा सकता है।
यह सभी बच्चों को उनकी शैली के अनुसार सीखने का अवसर देता है।
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प्रौद्योगिकी एकीकरण (ICT Integration): शिक्षा में तकनीक का प्रयोग समावेशी शिक्षा का
महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसमें ई-बुक्स, शैक्षिक ऐप्स, स्मार्ट क्लास, ऑडियोबुक्स और ऑनलाइन टूल्स का उपयोग किया जाता है।
यह सभी बच्चों को विशेष रूप से विकलांग बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ता है।
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सहायक शिक्षक (Special Educator): समावेशी कक्षा में सामान्य शिक्षक के साथ-साथ एक विशेष शिक्षक
की भी नियुक्ति की जाती है।
यह शिक्षक विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करता है।
साथ ही सामान्य शिक्षकों को भी बच्चों के लिए उपयुक्त रणनीति बनाने में मदद करता है।
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परामर्श और मार्गदर्शन (Counseling & Guidance): विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को अक्सर मानसिक,
भावनात्मक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
ऐसे में परामर्श (Counseling) और मार्गदर्शन (Guidance) उन्हें आत्मविश्वास बढ़ाने, तनाव कम करने और सही
दिशा चुनने में मदद करता है।
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समावेशी मूल्यांकन पद्धति: विशेष बच्चों के मूल्यांकन के लिए पारंपरिक परीक्षा पद्धति की बजाय
लचीली पद्धति अपनाई जाती है।
इसमें मौखिक परीक्षा, प्रोजेक्ट कार्य, प्रैक्टिकल, ओपन-बुक टेस्ट और ऑब्जर्वेशन आधारित मूल्यांकन किया
जाता है।
इससे बच्चे अपनी वास्तविक क्षमता दिखा पाते हैं।
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सहयोगात्मक अधिगम (Collaborative Learning): इसमें बच्चों को छोटे समूहों में बाँटकर एक-दूसरे के
साथ सीखने की प्रक्रिया कराई जाती है।
समूह कार्य, चर्चा और प्रोजेक्ट में सभी बच्चों की भागीदारी होती है।
इससे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों में आत्मविश्वास और सामाजिक सहयोग की भावना बढ़ती है।
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सामाजिक कौशल प्रशिक्षण: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सामाजिक व्यवहार, संचार कौशल और
आत्म-नियंत्रण सीखना ज़रूरी होता है।
इसके लिए रोल-प्ले, समूह चर्चा और व्यवहारिक गतिविधियों का उपयोग किया जाता है।
इससे वे समाज में बेहतर तरीके से घुलमिल पाते हैं।
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अनुकूली परीक्षा प्रणाली: परीक्षा में विशेष बच्चों के लिए कुछ सुविधाएँ दी जाती हैं।
जैसे – अतिरिक्त समय देना, बड़े अक्षरों वाला प्रश्नपत्र उपलब्ध कराना, सरल भाषा का प्रयोग करना या
सहायक लेखक उपलब्ध कराना।
इससे उन्हें समान अवसर मिलता है।
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पठन-पाठन सामग्री का अनुकूलन: शिक्षण सामग्री को बच्चों की आवश्यकता अनुसार बदला जाता है।
दृष्टिबाधित बच्चों के लिए बड़े अक्षरों वाली पुस्तकें और ऑडियोबुक्स, श्रवणबाधित बच्चों के लिए
चित्रात्मक सामग्री और रंगीन चार्ट,
तथा मानसिक रूप से धीमे बच्चों के लिए छोटे-छोटे मॉड्यूल बनाए जाते हैं।
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अभिभावक सहभागिता: विशेष बच्चों की शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं होती।
अभिभावक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि माता-पिता बच्चों की प्रगति पर ध्यान दें, शिक्षण में सहयोग करें और घर पर सकारात्मक वातावरण बनाएँ,
तो बच्चे तेजी से सीखते हैं और आत्मनिर्भर बनते हैं।
समावेशी बच्चों हेतु निर्देशन और परामर्श
- अर्थ: निर्देशन बच्चों को सही दिशा देना, परामर्श उनकी समस्याओं का समाधान और भावनात्मक समर्थन।
- उद्देश्य: आत्मविश्वास, सामाजिक समायोजन, और अधिगम बाधाओं को दूर करना।
- प्रकार: शैक्षिक, व्यावसायिक, व्यक्तिगत निर्देशन; व्यक्तिगत और समूह परामर्श।
- विधियाँ: साक्षात्कार, मनोवैज्ञानिक परीक्षण, ऑब्जर्वेशन, काउंसलिंग सेशन।
- आवश्यकता: विशेष बच्चों में आत्मसम्मान, सामाजिक कौशल, और अधिगम समर्थन।
- क्षेत्र: शैक्षिक, संवेगात्मक, सामाजिक, और स्वास्थ्य।
परामर्श में सहयोग देने वाले विभाग/संस्थाएँ
- मनोविज्ञानशाला, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज: मनोवैज्ञानिक सेवाएँ और मूल्यांकन।
- मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र: मंडल स्तर पर परामर्श और सहायता।
- जिला चिकित्सालय: स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ।
- जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET): प्रशिक्षित डायट मेंटर्स द्वारा शिक्षक प्रशिक्षण।
- पर्यवेक्षण और निरीक्षण तंत्र: शिक्षा विभाग द्वारा निगरानी।
- समुदाय और विद्यालय की सहयोगी समितियाँ: SMC और स्थानीय समुदाय।
- सरकारी और गैर-सरकारी संगठन: NCERT, UNICEF, ActionAid, Save the Children।
बाल-अधिगम में निर्देशन और परामर्श का महत्व
- निर्देशन और परामर्श विशेष बच्चों की अधिगम बाधाओं को दूर करता है।
- यह आत्मविश्वास, सामाजिक समायोजन, और कैरियर मार्गदर्शन में मदद करता है।
- महत्व: संवेगात्मक समर्थन, अधिगम सुधार, और समावेशी वातावरण निर्माण।
यूपी टीईटी और सीटीईटी के लिए अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020: समावेशी और समान शिक्षा।
- शिक्षा का अधिकार (RTE) 2009: सभी बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा।
- RPWD Act 2016: विकलांग व्यक्तियों के लिए शिक्षा और अधिकार।
- निरंतर और समग्र मूल्यांकन (CCE): समग्र विकास मूल्यांकन।
- वायगोत्स्की का सिद्धान्त: सामाजिक अंतःक्रिया और मचान (Scaffolding)।
- NCERT की भूमिका: समावेशी पाठ्यक्रम विकास।
- शिक्षक की भूमिका: समावेशी शिक्षा में सुगमकर्ता।