अधिगम के प्रमुख सिद्धान्त

अधिगम के प्रमुख सिद्धान्त

कक्षा शिक्षण में अधिगम सिद्धान्तों की व्यावहारिक उपयोगिता

थॉर्नडाइक का प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त (Edward Thorndike - Trial & Error Theory)

पैवलव का सम्बद्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त (Ivan Pavlov - Classical Conditioning)

स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त (B.F. Skinner – Operant Conditioning Theory)

कोहलर का सूझ या अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त (Kohler’s Insight Theory of Learning)

लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत

परिचय

लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) ने जीन पियाजे के नैतिक विकास के सिद्धांत को विस्तार देते हुए नैतिक विकास के अपने सिद्धांत को प्रस्तुत किया। कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन स्तरों में विभाजित किया, प्रत्येक स्तर में दो-दो अवस्थाएँ शामिल हैं। उनका मानना था कि नैतिक विकास का क्रम निश्चित होता है और यह आत्म (Self) और प्रत्याशाओं (Expectations) के संबंधों पर आधारित है। कोहलबर्ग का सिद्धांत नैतिक निर्णयों और व्यवहार के विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

नैतिक विकास के स्तर और अवस्थाएँ

कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत का शिक्षा में महत्व

निष्कर्ष

लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत नैतिक निर्णयों और व्यवहार के क्रमबद्ध विकास को समझाने में महत्वपूर्ण है। उनके तीन स्तर (प्राक्-रूढ़िगत, परंपरागत, और उत्तर-रूढ़िगत) और छह अवस्थाएँ बच्चों और किशोरों के नैतिक चिंतन के विकास को स्पष्ट करती हैं। यह सिद्धांत शिक्षा में बच्चों के व्यवहार को समझने, अनुशासन स्थापित करने, और नैतिक मूल्यों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोहलबर्ग का सिद्धांत शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चों के नैतिक विकास को प्रोत्साहित करने में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त (Jean Piaget’s Cognitive Development Theory)

जीन पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धांत

नैतिक विकास की अवस्थाएँ

नैतिकता के तीन स्तर

पियाजे ने नैतिक विकास की अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण विकास काल में नैतिकता के तीन स्तर बताए हैं:

निष्कर्ष

जीन पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धांत बच्चों के नैतिक निर्णयों और नैतिकता के विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह सिद्धांत दर्शाता है कि बच्चों का नैतिक विकास उनकी बौद्धिक परिपक्वता और पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया पर निर्भर करता है। नैतिक विकास की चार अवस्थाएँ (प्रतिमान हीनता, परायत्त-सत्ता, परायत्तता-पारस्परिकता, और स्वायत्तता) और नैतिकता के तीन स्तर (नैतिक यथार्थता, नैतिक समानता, और नैतिक सापेक्षिता) बच्चों के नैतिक चिंतन के क्रमबद्ध विकास को स्पष्ट करते हैं। यह सिद्धांत शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र में बच्चों के नैतिक विकास को प्रोत्साहित करने और मार्गदर्शन करने में उपयोगी है।

वायगोत्स्की का सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्त (Lev Vygotsky’s Socio-Cultural Theory)

सीखने का वक्र: अर्थ एवं प्रकार

सीखने में पठार: अर्थ, कारण एवं निराकरण