लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) ने जीन पियाजे के नैतिक विकास के सिद्धांत को विस्तार देते हुए नैतिक विकास के अपने सिद्धांत को प्रस्तुत किया। कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन स्तरों में विभाजित किया, प्रत्येक स्तर में दो-दो अवस्थाएँ शामिल हैं। उनका मानना था कि नैतिक विकास का क्रम निश्चित होता है और यह आत्म (Self) और प्रत्याशाओं (Expectations) के संबंधों पर आधारित है। कोहलबर्ग का सिद्धांत नैतिक निर्णयों और व्यवहार के विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत नैतिक निर्णयों और व्यवहार के क्रमबद्ध विकास को समझाने में महत्वपूर्ण है। उनके तीन स्तर (प्राक्-रूढ़िगत, परंपरागत, और उत्तर-रूढ़िगत) और छह अवस्थाएँ बच्चों और किशोरों के नैतिक चिंतन के विकास को स्पष्ट करती हैं। यह सिद्धांत शिक्षा में बच्चों के व्यवहार को समझने, अनुशासन स्थापित करने, और नैतिक मूल्यों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोहलबर्ग का सिद्धांत शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चों के नैतिक विकास को प्रोत्साहित करने में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
पियाजे के अनुसार, बच्चों में वास्तविकता को समझने और उसकी खोज करने की क्षमता न केवल उनकी परिपक्वता और न ही केवल उनके अनुभवों पर निर्भर करती है, बल्कि परिपक्वता और अनुभवों की पारस्परिक क्रिया पर आधारित होती है। यह सिद्धांत बच्चों के मानसिक विकास को विभिन्न अवस्थाओं में वर्गीकृत करता है और यह समझाता है कि बच्चे कैसे नई जानकारी को ग्रहण करते हैं और उसका उपयोग करते हैं।
जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत मनोविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है। यह सिद्धांत यह समझाने में मदद करता है कि बच्चे कैसे पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया करके बौद्धिक और मानसिक विकास करते हैं। पियाजे के संप्रत्यय जैसे आत्मसातीकरण, समायोजन, साम्यधारण, और संरक्षण बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को समझने में महत्वपूर्ण हैं। उनकी चार अवस्थाएँ बच्चों के विकास के विभिन्न चरणों को स्पष्ट करती हैं। यह सिद्धांत शिक्षकों, अभिभावकों, और मनोवैज्ञानिकों के लिए बच्चों की शिक्षा और विकास को बेहतर बनाने में उपयोगी है।
पियाजे ने नैतिक विकास की अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण विकास काल में नैतिकता के तीन स्तर बताए हैं:
जीन पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धांत बच्चों के नैतिक निर्णयों और नैतिकता के विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह सिद्धांत दर्शाता है कि बच्चों का नैतिक विकास उनकी बौद्धिक परिपक्वता और पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया पर निर्भर करता है। नैतिक विकास की चार अवस्थाएँ (प्रतिमान हीनता, परायत्त-सत्ता, परायत्तता-पारस्परिकता, और स्वायत्तता) और नैतिकता के तीन स्तर (नैतिक यथार्थता, नैतिक समानता, और नैतिक सापेक्षिता) बच्चों के नैतिक चिंतन के क्रमबद्ध विकास को स्पष्ट करते हैं। यह सिद्धांत शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र में बच्चों के नैतिक विकास को प्रोत्साहित करने और मार्गदर्शन करने में उपयोगी है।
लेव वायगोत्सकी (Lev Vygotsky) एक रूसी मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों पर विशेष जोर दिया। वे जीन पियाजे से प्रभावित थे, लेकिन उनके सिद्धांत में पियाजे से कई सैद्धांतिक मतभेद थे। वायगोत्सकी ने बच्चों के संज्ञानात्मक विकास में सामाजिक अंतःक्रिया, भाषा, और शिक्षक की भूमिका को महत्वपूर्ण माना, जबकि पियाजे ने परिपक्वता (Maturation) पर अधिक बल दिया। वायगोत्सकी का सिद्धांत सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत (Socio-Cultural Theory) के रूप में भी जाना जाता है।
वायगोत्सकी ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि संज्ञानात्मक विकास एक अंतर्वैयक्तिक (Interpersonal) सामाजिक परिस्थिति में होता है, जिसमें बच्चे अपने वास्तविक विकास स्तर (Real Level of Development) से संभाव्य विकास स्तर (Potential Level of Development) की ओर बढ़ते हैं। इन दोनों स्तरों के बीच के अंतर को समीपस्थ विकास का क्षेत्र (Zone of Proximal Development - ZPD) कहा जाता है।
वायगोत्सकी ने भाषा के विकास की दो प्रमुख अवस्थाएँ बताईं:
वायगोत्सकी ने चिंतन के विकास की निम्नलिखित अवस्थाएँ बताईं:
वायगोत्सकी का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों पर आधारित है, जो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया में भाषा, सहयोगात्मक अधिगम, और शिक्षक की भूमिका को महत्व देता है। समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD) इस सिद्धांत का एक केंद्रीय विचार है, जो बच्चों के वास्तविक और संभाव्य विकास स्तर के बीच की दूरी को दर्शाता है। वायगोत्सकी ने निजी संभाषण और खेल को भी बच्चों के चिंतन और आत्म-नियंत्रण के विकास में महत्वपूर्ण माना। यह सिद्धांत शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र में बच्चों के विकास को समझने और सहयोगात्मक अधिगम को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।