अधिगम में पठार (Plateau in Learning)

पठार के बारे में विद्वानों के कथन

  • Ross: सीखने की प्रक्रिया की एक प्रमुख विशेषता पठार है, जो उस अवधि को व्यक्त करते हैं, जब सीखने की क्रिया में कोई उन्नति नहीं होती है।
  • Rex & Knight: सीखने के पठार तब उत्पन्न होते हैं, जब व्यक्ति सीखने की एक अवस्था पर पहुँच जाता है और दूसरी अवस्था में प्रवेश करता है।
  • Sorenson: सीखने की अवधि में पठार साधारणतया कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों या कुछ महीनों तक रहते हैं।
  • Stephens: यदि किसी जटिल कार्य के केवल एक पक्ष पर ध्यान दिया जाता है और दूसरे पक्षों की उपेक्षा की जाती है, तो पठार बन जाती है।
  • Reyburn: प्रत्येक कार्य के लिए प्रत्येक व्यक्ति में अधिकतम कुशलता होती है, जिससे आगे वह नहीं बढ़ सकता है। इसको शारीरिक सीमा कहते हैं। जब व्यक्ति इस सीमा पर पहुँच जाता है, तब उसके सीखने में पठार बन जाता है।
  • Sorenson: शायद ऐसी कोई विधि नहीं है, जिससे पठारों को बिल्कुल समाप्त किया जा सके, पर उनकी संख्या और अवधि को कम किया जा सकता है।

परिभाषा: जब सीखने की प्रगति रुक जाती है और कोई उन्नति या अवनति नहीं होती, उसे पठार कहा जाता है।

पठार के कारण:

  • प्रेरणा का अभाव: प्रेरणा की कमी से प्रगति रुक सकती है।
  • रुचि की कमी: यदि कार्य में रुचि न हो, तो पठार उत्पन्न होता है।
  • शारीरिक सीमा: शारीरिक थकान या सीमाएँ प्रगति को रोक सकती हैं।
  • संघर्ष: आंतरिक या बाह्य संघर्ष अधिगम को प्रभावित करते हैं।
  • निराशा: बार-बार असफलता से निराशा पठार का कारण बनती है।
  • थकान: मानसिक या शारीरिक थकान प्रगति को बाधित करती है।
  • पारिवारिक वातावरण: अनुपयुक्त वातावरण अधिगम को प्रभावित करता है।

पठार को दूर करने के उपाय

  1. प्रेरणा देना: सीखने वाले को प्रेरित करने के लिए पुरस्कार, प्रोत्साहन, या लक्ष्य-निर्देशित गतिविधियाँ प्रदान करना।
  2. विश्राम देना: कार्य के बीच-बीच में उचित अंतराल और विश्राम देना, ताकि थकान और एकरसता कम हो।
  3. उचित विधियों का प्रयोग: सीखने की प्रभावी और रुचिकर विधियों (जैसे गतिविधि-आधारित शिक्षण) का उपयोग।
  4. वातावरण का सुधार: सकारात्मक, शांत, और प्रेरणादायक शिक्षण वातावरण बनाना।
  5. नवीन प्रणालियों का प्रयोग: नई तकनीकों, जैसे इंटरैक्टिव शिक्षण साधन या डिजिटल उपकरणों का उपयोग।
  6. उत्साहवर्धन: बालकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उनकी उपलब्धियों की प्रशंसा करना और उत्साहवर्धक गतिविधियाँ शामिल करना।

अधिगम वक्र (Learning Curve)

परिभाषा

अधिगम वक्र: यह एक ग्राफीय रेखा है जो सीखने की प्रगति या अवनति को दर्शाती है। यह अभ्यास द्वारा सीखने की मात्रा, गति, और उन्नति की सीमा को प्रदर्शित करती है।

गेट्स व अन्य के अनुसार: अधिगम वक्र अभ्यास के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को ग्राफ पर प्रदर्शित करते हैं, जो सीखने की गति और प्रगति को समझने में सहायक है।

अधिगम वक्र के बारे में विद्वानों के कथन

  • Skinner: A Learning Curve is a graphic representation of a person's improvement in a given activity.
  • Gates & others: सीखने के वक्र - अभ्यास द्वारा सीखने की मात्रा, गति और उन्नति की सीमा का ग्राफ पर प्रदर्शन है।
  • Gates & others: उन्नति की गति समान नहीं होती। अंतिम अवस्था की तुलना में प्रारंभिक अवस्था में उन्नति की गति बहुत अधिक होती है।
  • Gates & others: सीखने की प्रारंभिक गति बहुधा तीव्र होती है पर इसको किसी भी दिशा में सीखने की सर्वभौमिक विशेषता नहीं कहा जा सकता है।
  • Skinner: सीखने में प्रतिदिन चढ़ाव-उतार आता है पर सीखने वाले की सामान्य प्रगति एक निश्चित दिशा में होती है।
  • Gates & others: सिद्धांत के रूप में तो सीखने में उन्नति की पूर्ण सीमा संभव है, पर व्यवहार में यह शायद कभी भी प्राप्त नहीं होती।

अधिगम वक्र के प्रकार

अधिगम वक्र के प्रकार

सरल रेखीय वक्र

उन्नतोदर वक्र

उन्नतोदर वक्र (Negatively Accelerated)

नतोदर वक्र

नतोदर वक्र (Positively Accelerated)

S-आकारीय वक्र

S-आकारीय वक्र (S-Shaped Curve)

पठारी वक्र

पठारी वक्र (Plateau Curve)

  1. सरल रेखीय वक्र (Linear Learning Curve):
    विवरण: सीखने की गति एक समान रहती है।
    उदाहरण: सरल कार्यों में, जैसे अक्षर लिखना सीखना।
  2. उन्नतोदर वक्र / अवनमन निष्पादन वक्र (Negatively Accelerated Curve):
    विवरण: प्रारंभ में सीखने की गति तीव्र होती है, लेकिन धीरे-धीरे मंद पड़ जाती है।
    उदाहरण: जब कोई नया कौशल (जैसे टाइपिंग) शुरू में तेजी से सीखा जाता है, लेकिन बाद में प्रगति धीमी हो जाती है।
  3. नतोदर वक्र / उर्ध्वमान निष्पादन वक्र (Positively Accelerated Curve):
    विवरण: प्रारंभ में सीखने की गति मंद होती है, लेकिन धीरे-धीरे तीव्र हो जाती है।
    उदाहरण: जटिल कार्यों (जैसे गणितीय अवधारणाएँ) में प्रारंभ में धीमी प्रगति, फिर तेजी।
  4. मिश्रित वक्र / S-आकारीय वक्र (S-Shaped Curve):
    विवरण: यह उन्नतोदर और नतोदर वक्र का मिश्रित रूप है। प्रारंभ में धीमी गति, फिर तीव्र प्रगति, और अंत में फिर धीमी गति।
    उदाहरण: भाषा सीखने में शुरू में कठिनाई, फिर तेज प्रगति, और अंत में स्थिरीकरण।
  5. पठारी वक्र (Plateau Curve):
    विवरण: सीखने की गति स्थिर हो जाती है, न उन्नति होती है और न ही अवनति।
    उदाहरण: जब कोई व्यक्ति किसी कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर लेता है, लेकिन आगे प्रगति रुक जाती है।

अधिगम वक्र की विशेषताएँ

अधिगम वक्र को तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है:

  1. प्रारंभिक अवस्था: इस अवस्था में सीखने की गति में लोचता (Flexibility) देखी जाती है। यह सार्वभौमिक विशेषता नहीं है, क्योंकि गति कार्य की प्रकृति पर निर्भर करती है। उदाहरण: नए कार्य को सीखने में प्रारंभिक उत्साह और प्रगति।
  2. मध्य अवस्था: जैसे-जैसे व्यक्ति अभ्यास करता है, वह सीखने में उन्नति करता है। उन्नति का स्वरूप अस्थायी हो सकता है; कभी तेज, तो कभी धीमी। यह अवस्था प्रेरणा, रुचि, और कार्य की जटिलता पर निर्भर करती है।
  3. अंतिम अवस्था: सीखने की गति धीमी पड़ जाती है, और व्यक्ति अपनी सीखने की सीमा (Learning Limit) तक पहुँच जाता है। इस अवस्था में प्रगति स्थिर हो सकती है या रुक सकती है।

सीखने की गति को प्रभावित करने वाले कारक

सीखने की गति निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है:

  • रुचि: विषय या कार्य में रुचि प्रगति को बढ़ाती है।
  • प्रेरणा: आंतरिक और बाह्य प्रेरणा अधिगम को प्रोत्साहित करती है।
  • जिज्ञासा: सीखने की उत्सुकता प्रगति को तेज करती है।
  • उत्साह: उत्साहपूर्ण दृष्टिकोण अधिगम को सकारात्मक बनाता है।
  • कार्य की सरलता/कठिनता: सरल कार्यों में प्रगति तेज, जटिल कार्यों में धीमी हो सकती है।

टिप्पणी

अधिगम वक्र का महत्व: यह शिक्षकों और शिक्षार्थियों को प्रगति को समझने, कमियों को पहचानने, और शिक्षण रणनीतियों को समायोजित करने में मदद करता है।

पठार का समाधान: पठार को दूर करने के लिए प्रेरणा बढ़ाना, रुचिकर गतिविधियाँ शामिल करना, और कार्य को सरल बनाना उपयोगी हो सकता है।