ध्वनि एवं इसके प्रकार
ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है जो किसी वस्तु के कम्पन के कारण उत्पन्न होती है और कानों द्वारा ग्रहण की जाती है। ध्वनि माध्यम के कणों के कम्पन के रूप में संचरित होती है। उदाहरण: घंटी की आवाज।
विभिन वाद्य यंत्रों से ध्वनि उत्त्पन्न करने की विधियाँ
- आघात से
- तारों को खींच कर छोड़ने से
- रगड़ने से
- फूंक मारने से
ध्वनि के प्रकार:
- प्रबल (Loud) तथा मंद (Weak) ध्वनि: ध्वनि की प्रबलता (Loudness) यह बताती है कि कोई ध्वनि कितनी तेज या कितनी धीमी है। यह ध्वनि तरंगों के आयाम (Amplitude) पर निर्भर करती है। अधिक आयाम वाली ध्वनि प्रबल तथा कम आयाम वाली ध्वनि मंद होती है। प्रबल ध्वनि दूर तक सुनाई देती है जबकि मंद ध्वनि केवल पास में ही सुनाई देती है। उदाहरण: कागज पलटने से उत्पन्न ध्वनि मंद होती है, लाउडस्पीकर की ध्वनि प्रबल होती है तथा बादलों की गड़गड़ाहट अत्यधिक प्रबल ध्वनि का उदाहरण है।
- भारी (Grave) तथा पतली (Shrill) ध्वनि: ध्वनि का तारत्व (Pitch) यह बताता है कि ध्वनि भारी है या पतली। यह ध्वनि की आवृत्ति (Frequency) पर निर्भर करता है। अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि पतली तथा कम आवृत्ति वाली ध्वनि भारी होती है। तारत्व से हम अलग-अलग आवाजों में अंतर कर पाते हैं। उदाहरण: बिल्ली की आवाज की आवृत्ति कुत्ते की आवाज से अधिक होती है, इसलिए बिल्ली की आवाज पतली तथा कुत्ते की आवाज भारी होती है।
- प्रिय (Pleasant) तथा अप्रिय (Unpleasant) ध्वनि: ध्वनि की गुणता (Quality) यह व्यक्त करती है कि ध्वनि सुनने में मधुर और सुखद है या कर्कश और अप्रिय। गुणता के आधार पर हम समान आवृत्ति और समान प्रबलता वाली ध्वनियों में भी अंतर कर सकते हैं। उदाहरण: संगीत वाद्ययंत्रों से निकलने वाली ध्वनि प्रिय होती है, जबकि मशीनों का शोर, ट्रैफिक की आवाज और पटाखों की तेज आवाज अप्रिय ध्वनि के उदाहरण हैं।
- श्रव्य ध्वनि: वह ध्वनि जिसे मानव कान स्पष्ट रूप से सुन सकता है। इसकी आवृत्ति सीमा लगभग 20 Hz से 20,000 Hz तक होती है। यह ध्वनि दैनिक जीवन में संचार, शिक्षा और मनोरंजन का मुख्य साधन है तथा भाषा और संगीत के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करने में सहायता करती है। उदाहरण: मानव भाषण, पक्षियों की चहचहाहट, रेडियो और टीवी की आवाज, गिटार और तबला जैसे संगीत वाद्ययंत्रों से उत्पन्न ध्वनि।
- अपश्रव्य ध्वनि: 20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि को अपश्रव्य (इन्फ्रासोनिक) ध्वनि कहते हैं। यह वह ध्वनि होती है जिसे मानव कान सुनने में असमर्थ होता है क्योंकि इसकी आवृत्ति श्रव्य सीमा से नीचे होती है। इस ध्वनि का उपयोग कुछ बड़े जीव-जंतु संचार तथा प्राकृतिक घटनाओं की पहचान में करते हैं और इसका अध्ययन वैज्ञानिक अनुसंधान में किया जाता है। उदाहरण: हाथी द्वारा उत्पन्न ध्वनि, भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट से उत्पन्न निम्न आवृत्ति वाली ध्वनियाँ।
- पराश्रव्य ध्वनि: 20,000 Hz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि को पराश्रव्य ध्वनि कहते हैं। इसका उपयोग चिकित्सा, उद्योग और विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है क्योंकि यह ठोस पदार्थों के अंदर तक प्रवेश कर उनकी आंतरिक संरचना की जानकारी प्रदान करती है। उदाहरण: अल्ट्रासाउंड मशीन द्वारा गर्भ में भ्रूण का निरीक्षण, किडनी स्टोन की पहचान, धातुओं में दरार की जाँच तथा सोनार तकनीक द्वारा समुद्र में वस्तुओं की दूरी मापना।
कम्पन करती वस्तु से ध्वनि की उत्पत्ति एवं इसकी तीव्रता
ध्वनि किसी भी कम्पन करती वस्तु से उत्पन्न होती है। जब कोई वस्तु कम्पन करती है तो वह अपने आसपास के माध्यम (हवा, जल या ठोस) के कणों में क्रमिक संपीडन (Compression) और विरलन (Rarefaction) उत्पन्न करती है, जिससे ध्वनि तरंगें बनती हैं। ये तरंगें ऊर्जा के रूप में आगे बढ़ती हैं, न कि पदार्थ के रूप में। उदाहरण: गिटार की तार का कम्पन, घंटी का बजना, स्पीकर का कम्पन।
- उत्पत्ति: कम्पन करते समय वस्तु आसपास के कणों में दबाव तरंगें उत्पन्न करती है, जिससे ध्वनि का संचरण होता है। ध्वनि उत्पन्न होने के लिए तीन आवश्यक शर्तें होती हैं — (1) कम्पन करने वाली वस्तु, (2) माध्यम, (3) श्रोता। उदाहरण: ड्रम की झिल्ली का कम्पन, ट्यूनिंग फोर्क का कम्पन।
- तीव्रता: ध्वनि की तीव्रता कम्पन के आयाम (Amplitude) और ऊर्जा पर निर्भर करती है। अधिक आयाम वाली ध्वनि अधिक तीव्र तथा कम आयाम वाली ध्वनि मंद होती है। तीव्र ध्वनि कानों को नुकसान भी पहुँचा सकती है। उदाहरण: जोर से ड्रम बजाने से तेज ध्वनि तथा धीरे बजाने से मंद ध्वनि।
- माप: ध्वनि की तीव्रता को डेसिबल (dB) में मापा जाता है। 0 dB मानव श्रवण की न्यूनतम सीमा है जबकि 120 dB से अधिक ध्वनि हानिकारक होती है। उदाहरण: फुसफुसाहट (~20 dB), सामान्य बातचीत (~60 dB), रॉक कॉन्सर्ट (~120 dB)।
कम्पन का आयाम, आवर्तकाल, और आवृत्ति
कम्पन की प्रकृति को समझने के लिए तीन प्रमुख भौतिक राशियाँ प्रयोग की जाती हैं — आयाम, आवर्तकाल और आवृत्ति। ये सभी ध्वनि के गुणों को निर्धारित करती हैं।
- आयाम: कम्पन का अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है। यह ध्वनि की प्रबलता को निर्धारित करता है। अधिक आयाम = तेज ध्वनि, कम आयाम = मंद ध्वनि। उदाहरण: गिटार की तार का अधिक हिलना अधिक आयाम को दर्शाता है।
- आवर्तकाल: एक पूर्ण कम्पन पूरा करने में लगने वाला समय आवर्तकाल कहलाता है। इसे सेकंड (s) में मापा जाता है। उदाहरण: पेंडुलम का एक पूरा आगे-पीछे जाना एक आवर्तकाल है।
- आवृत्ति: प्रति सेकंड होने वाले कम्पनों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं। इसकी इकाई हर्ट्ज़ (Hz) होती है। आवृत्ति ध्वनि के तारत्व (Pitch) को निर्धारित करती है। उदाहरण: ‘A’ नोट की ध्वनि 440 Hz होती है।
- संबंध: आवृत्ति = 1 / आवर्तकाल। यह गणितीय संबंध परीक्षा में महत्वपूर्ण सूत्र के रूप में पूछा जाता है। उदाहरण: यदि आवर्तकाल 2 सेकंड है तो आवृत्ति = 0.5 Hz।
- प्रभाव: अधिक आयाम = तेज ध्वनि; अधिक आवृत्ति = तीखी (पतली) ध्वनि। उदाहरण: बांसुरी की तीखी ध्वनि अधिक आवृत्ति के कारण होती है जबकि ढोल की आवाज भारी होती है।
ध्वनि का संचरण (ठोस, द्रव, और गैसीय माध्यम)
ध्वनि तरंगों के रूप में कणों के कम्पन द्वारा संचरित होती है। ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम का होना आवश्यक है। निर्वात में ध्वनि नहीं चल सकती। माध्यम के प्रकार के अनुसार ध्वनि की गति भिन्न-भिन्न होती है। उदाहरण: दीवार के माध्यम से पड़ोसी की आवाज सुनना।
- ठोस: ठोस में कण अत्यधिक पास-पास होते हैं, इसलिए ध्वनि सबसे तेज गति से संचरित होती है। उदाहरण: रेल पटरियों पर कान लगाकर ट्रेन की आवाज पहले सुनाई देना।
- द्रव: द्रव में कण मध्यम दूरी पर होते हैं, इसलिए ध्वनि की गति ठोस से कम परंतु गैस से अधिक होती है। उदाहरण: पानी में व्हेल की आवाज का दूर तक सुनाई देना।
- गैस: गैस में कण बहुत दूर-दूर होते हैं, इसलिए ध्वनि की गति सबसे कम होती है। उदाहरण: हवा में चिल्लाने की आवाज।
- निर्वात: निर्वात में कोई माध्यम नहीं होता, इसलिए ध्वनि का संचरण संभव नहीं है। उदाहरण: अंतरिक्ष में कोई आवाज नहीं सुनाई देती।
ध्वनि की चाल
ध्वनि की गति माध्यम के प्रकार और तापमान पर निर्भर करती है। उदाहरण: हवा में ध्वनि की चाल ~343 m/s।
| माध्यम | चाल (m/s) | उदाहरण |
|---|---|---|
| हवा (20°C) | 343 | बिजली की गड़गड़ाहट |
| पानी | 1480 | पानी में तैरते समय आवाज |
| इस्पात | 5200 | रेल पटरियों पर ध्वनि |
प्रभाव: तापमान और घनत्व में बदलाव से ध्वनि की चाल बदलती है। उदाहरण: गर्मी में हवा में ध्वनि तेज सुनाई देती है।
ध्वनि का परावर्तन - प्रतिध्वनि और गुंज
जब ध्वनि तरंगें किसी कठोर या चिकनी सतह से टकराती हैं तो वे वापस लौट आती हैं, इसे ध्वनि का परावर्तन कहते हैं। परावर्तन के कारण प्रतिध्वनि और गुंज उत्पन्न होती है। प्रतिध्वनि सुनने के लिए ध्वनि और उसके परावर्तन के बीच कम से कम 0.1 सेकंड का अंतर होना आवश्यक है। उदाहरण: गुफा या पहाड़ों में चिल्लाने पर आवाज का वापस सुनाई देना।
- प्रतिध्वनि: स्पष्ट रूप से अलग-अलग सुनाई देने वाली परावर्तित ध्वनि को प्रतिध्वनि कहते हैं। इसके लिए परावर्तक सतह की दूरी लगभग 16.6 मीटर या उससे अधिक होनी चाहिए। उदाहरण: पहाड़ों में “हैलो” बोलने पर वही शब्द वापस सुनाई देना।
- गुंज: जब ध्वनि कई बार परावर्तित होकर आपस में मिल जाती है और अलग-अलग पहचान में नहीं आती, तो उसे गुंज (Reverberation) कहते हैं। यह बड़े हॉल या खाली कमरों में अधिक सुनाई देती है। उदाहरण: बड़े सभागार में बोलने पर आवाज का फैल जाना।
- उपयोग: ध्वनि के परावर्तन का उपयोग वैज्ञानिक और व्यावहारिक क्षेत्रों में किया जाता है। उदाहरण: सोनार द्वारा समुद्र की गहराई मापना, सभागारों और सिनेमा हॉल का ध्वनि-डिज़ाइन करना, संगीत हॉल में ध्वनि की गुणवत्ता बढ़ाना।
मनुष्य द्वारा उत्पन्न की गई ध्वनियाँ
मनुष्य ध्वनि उत्पन्न करने के लिए मुख्यतः स्वरयंत्र (Larynx) और विभिन्न यंत्रों का प्रयोग करता है। फेफड़ों से निकलने वाली वायु जब स्वरयंत्र से होकर गुजरती है तो वोकल कॉर्ड्स में कम्पन उत्पन्न होता है और ध्वनि बनती है। उदाहरण: गाना गाना, बोलना, भाषण देना।
- स्वरयंत्र: वोकल कॉर्ड्स के कम्पन से ध्वनि उत्पन्न होती है। स्वर की ऊँचाई और तीव्रता वायु के दबाव और कॉर्ड्स के तनाव पर निर्भर करती है। उदाहरण: बोलना, चिल्लाना, गाना।
- यंत्र: वे उपकरण जिनसे संगीतमय ध्वनि उत्पन्न होती है। इनमें तार वाले, वायु वाले और झिल्ली वाले वाद्ययंत्र शामिल हैं। उदाहरण: तबला, पियानो, बाँसुरी, गिटार।
सुनने और बोलने की प्रक्रिया
सुनने और बोलने की प्रक्रिया मानव शरीर के विभिन्न अंगों के समन्वय से होती है। कान ध्वनि तरंगों को ग्रहण करता है और मस्तिष्क उन्हें पहचानता है, जबकि बोलने में स्वरयंत्र मुख्य भूमिका निभाता है।
- सुनना: कान ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर उन्हें विद्युत संकेतों में बदलकर मस्तिष्क तक पहुँचाता है। उदाहरण: घंटी या मोबाइल की आवाज सुनना।
- बोलना: फेफड़ों से निकली वायु स्वरयंत्र से होकर गुजरती है और वोकल कॉर्ड्स में कम्पन उत्पन्न कर ध्वनि बनाती है। उदाहरण: “हाय” या “नमस्ते” कहना।
- सुनने की प्रक्रिया: बाहरी कान → कर्णपटह → मध्य कान → आंतरिक कान → श्रवण तंत्रिका → मस्तिष्क। उदाहरण: रेडियो या टीवी की आवाज सुनना।
- बोलने की प्रक्रिया: फेफड़े → स्वरयंत्र → मुख व जीभ → स्पष्ट ध्वनि। उदाहरण: भाषण देना या कविता पढ़ना।
शोर - हानिकारक प्रभाव और नियंत्रण
अवांछित, कर्कश या अत्यधिक तीव्र ध्वनि को शोर कहते हैं। यह मानव स्वास्थ्य तथा मानसिक शांति के लिए हानिकारक होती है। उदाहरण: ट्रैफिक की तेज आवाज, मशीनों का शोर।
- श्रवण हानि। उदाहरण: तेज संगीत या हॉर्न से सुनने की क्षमता कम होना।
- तनाव और नींद में बाधा। उदाहरण: लगातार ट्रैफिक शोर से अनिद्रा।
- स्वास्थ्य समस्याएँ। उदाहरण: उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, और हृदय रोग का खतरा।
- ध्वनिरोधी सामग्री का प्रयोग। उदाहरण: दीवारों पर फोम या साउंड प्रूफिंग लगाना।
- कान के प्लग और इयरफोन का सीमित उपयोग। उदाहरण: इयरप्लग से तेज ध्वनि से बचाव।
- शांत क्षेत्र बनाना। उदाहरण: अस्पतालों, स्कूलों और लाइब्रेरी में साइलेंस जोन।