1. अपशिष्ट पदार्थ
परिभाषा: अपशिष्ट वे पदार्थ हैं जो उपयोग के बाद अनुपयोगी हो जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन ने अपशिष्ट प्रबंधन को पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा बनाया।
- 1986 में भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम ने अपशिष्ट निस्तारण को नियंत्रित किया।
2. अपशिष्ट पदार्थ (कचरा) के प्रकार
ठोस अपशिष्ट: कागज, प्लास्टिक, धातु, और जैविक कचरा जैसे खाद्य अवशेष।
द्रव अपशिष्ट: गंदा पानी, औद्योगिक रासायनिक अपशिष्ट, और सीवेज।
गैसीय अपशिष्ट: कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, और औद्योगिक उत्सर्जन।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने गैसीय अपशिष्ट (CFC) को कम करने पर जोर दिया।
- 1977 में भारत में जल (प्रदूषण निवारण) अधिनियम द्रव अपशिष्ट को नियंत्रित करता है।
3. अपशिष्ट पदार्थों के स्रोत
स्रोत:
- घरेलू: रसोई का कचरा, प्लास्टिक, और गंदा पानी।
- औद्योगिक: रासायनिक अपशिष्ट, धातु, और गैसें।
- वाणिज्यिक: कार्यालयों और दुकानों से कागज और पैकेजिंग।
- कृषि: कीटनाशक और जैविक कचरा।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 1962 में रेचल कार्सन की पुस्तक "Silent Spring" ने कीटनाशकों से उत्पन्न अपशिष्ट की समस्या को उजागर किया।
4. ई-कचरा
परिभाषा: इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे मोबाइल, कंप्यूटर, और टीवी से उत्पन्न कचरा।
महत्व:
- ई-कचरे में सीसा, पारा जैसे खतरनाक पदार्थ होते हैं।
- इसका अनुचित निस्तारण मिट्टी और जल को प्रदूषित करता है।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 2016 में भारत में ई-कचरा प्रबंधन नियम लागू हुए।
- 2003 में बेसल कन्वेंशन ने खतरनाक ई-कचरे के वैश्विक व्यापार को नियंत्रित किया।
5. अपशिष्ट संग्रह का प्रभाव
प्रभाव:
- पर्यावरणीय: जल, मिट्टी, और वायु प्रदूषण।
- स्वास्थ्य: रोगों का प्रसार, जैसे डेंगू और मलेरिया।
- सौंदर्य: कचरे के ढेर से शहरों की सुंदरता प्रभावित होती है।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 1994 में सूरत में प्लेग की घटना अपशिष्ट संग्रह की कमी से जुड़ी थी।
6. भोपाल गैस त्रासदी
विवरण: 2-3 दिसंबर 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ।
प्रभाव:
- हजारों लोगों की मृत्यु और लाखों प्रभावित।
- पर्यावरण और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- यह विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी थी।
- इसके बाद 1986 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ।
7. अपशिष्ट का निस्तारण
7.1 ठोस अपशिष्ट का निस्तारण
जलाकर (Incineration): कचरे को उच्च तापमान पर जलाना।
भूमि-भरण (Landfilling): कचरे को जमीन में दबाना।
कम्पोस्टिंग: जैविक कचरे (गीला कचरा) को खाद में बदलना।
सूखा कचरा: प्लास्टिक और कागज को पुनर्चक्रण के लिए अलग करना।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 2016 में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम (SWM Rules) लागू हुए।
7.2 द्रव अपशिष्ट का निस्तारण
सीवेज सिस्टम: गंदे पानी को नालियों के माध्यम से ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाना।
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट: अपशिष्ट जल को शुद्ध करना।
सोकपिट: छोटे स्तर पर गंदे पानी को मिट्टी में सोखना।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 1977 में जल (प्रदूषण निवारण) अधिनियम ने सीवेज प्रबंधन को मजबूत किया।
7.3 गैसीय अपशिष्ट का निस्तारण
तरीके:
- स्क्रबर और फिल्टर का उपयोग।
- उत्सर्जन को कम करने के लिए स्वच्छ प्रौद्योगिकी।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) ने गैसीय अपशिष्ट को कम करने पर जोर दिया।
8. कचरा प्रबंधन हेतु 4R सुझाव
R1 - Refuse (मना करना): अनावश्यक वस्तुओं को लेने से इंकार करना।
R2 - Reduce (कम करना): कचरे के उत्पादन को कम करना।
R3 - Reuse (पुन: उपयोग): वस्तुओं को दोबारा उपयोग करना।
R4 - Recycle (पुनर्चक्रण): कचरे को नए उत्पादों में बदलना।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 2008 में भारत में प्लास्टिक पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के लिए नियम लागू हुए।
9. अपशिष्ट निस्तारण हेतु सरकारी प्रयास
प्रयास:
- स्वच्छ भारत मिशन (2014): देश में स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को बढ़ावा।
- नमामि गंगे (2016): गंगा नदी में द्रव अपशिष्ट को कम करना।
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (2019): वायु प्रदूषण और गैसीय अपशिष्ट को नियंत्रित करना।
महत्वपूर्ण तथ्य :
- 2014 में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) को हुई।
- 1981 में वायु (प्रदूषण निवारण) अधिनियम लागू हुआ।